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9 नवंबर 2010

तुमि आमार ध्यान (बांगला)

तुमि आमार ध्यान, तुमि आमार ज्ञान,
तुमि आमार संसार |
तोमाय हारिये कांदी,तोमाये फिरिये हाँसि,
तुमि मोर जीवनेर सार ||

पूर्वास्ये देखि तोमार अरुणिमा,
पश्चिमास्ये हेरी तोमारई लालिमा |
मध्य गगने तुमि सुतीब्र द्रघिमा,
तोमार लीला अपार ||

जीवनेर प्रभाते तुमि प्रिय उत्सव,
मध्याहाने तुमि कर्मेरइ  आसब |
सायाह्ने तुमि प्रिय धोरे रूप अभिनव ,
टेने नाओ काछे तोमार ||

भावार्थ : तुम ही मेरा ध्यान हो, तुम ही मेरा ज्ञान हो और तुम ही मेरा संसार हो | हे मेरे जीवन के सार तत्त्व, तुम्हे खोकर मैं रोता हूँ  और तुम्हे वापस पाकर मैं हँसता हूँ ?

पूर्व में, मैं तुम्हारी अरुण आभा को और पश्चिम में तुम्हारी लालिमा को निहारता हूँ | मध्य आकाश में तुम तेज धूप के रूप चमकते हो | तुम्हारी लीला अपरम्पार है |

जीवन कि सुबह(बचपन) में तुम ही मेरे प्रिय उत्सव हो | दोपहर(युवावस्था) में  तुम मेरे कर्म कि जीवनी शक्ति हो और सायंकाल(बुढ़ापे) में, हे प्रिय, तुम नया आकर्षक रूप धरकर मुझे अपनी ओर आकर्षित कर लेते हो, खींच लेते हो |

30 अक्टूबर 2010

त्वमसि सर्वेषां पिता (प्रभात संगीत )


त्वमसि सर्वेषां पिता त्वमसि मम देवता |
त्वमसि त्रिलोकनाथः नमस्कृत्यं गंगाधरम ||

विषये विषये पूज्यः आशये आशये युज्यः |
अणुशये अनासक्तः नास्ति तव काल स्थानं ||

ईशोSसि अनीशोSसि त्वं गुणी गुणातीतोSसि त्वं |
गणनाथः गणप्रभुः देवानामादिदेवः त्वं ||



भावार्थ : तुम सब के पिता हो, तुम मेरे देवता हो | तुम तीनों लोकों के स्वामी हो | हे गंगा को धारण करने वाले शिव मैं तुम्हे नमस्कार करता हूँ | समस्त विषयों में तुम पूजनीय हो | सब  के मूल या सार से तुम जुड़े हुए हो | तुम सब से अनासक्त भी हो | तुम्हारा कोई काल या स्थान नहीं है अर्थात तुम कालातीत और देशातीत हो | तुम नियंत्रक सत्ता हो और तुम ही नियंत्रित सत्ता भी हो | प्रकृति के गुणों से प्रभावित सारा अस्तित्व  तुम ही हो , परन्तु तुम गुणों के परे भी हो (तुम गुणाधीन,गुणाधीश तथा गुणातीत  हो) | अपने शिष्यों और भक्तों के तुम मालिक हो ; तुम उनके आराध्य-परमाराध्य हो | देवताओं में सर्वप्रथम तुम हो, तुम आदिदेव हो |